Saturday, 14 September 2013

परीक्षा !!




सुबह सुबह नींद के आगोश से जब बाहर निकले
तो झाँका खिड़की से बाहर, मौसम खुशनुमा लग रहा था |
मेज पर खुली पड़ी किताब थी,
और एक जवाब अभी भी अधूरा सा लग रहा था |

छोड़ के बिस्तर का आराम, हम उठ खड़े हुए,
तब पाया कि दिल में एक दर्द सा उठ रहा था |
तबियत का तो ना हाल पूछिए,
बस दोपहर के इम्तेहान का डर सता रहा था |

बैठे थे सवालों के इंतज़ार में,
दिल हमारा घबरा रहा था |
सहमी हुई साँसें थी सबकी चारों ओर,
और दिमाग़ हमारा अब भी उबासियाँ ले रहा था |

एक नज़र जो डाली उस काग़ज़ पर,
कि दिमाग़ अब भी जागने से इनकार कर रहा था |
देखा चारों और, साथियों से नज़रें चार हुईं,
तब जाना की हमारा पड़ोसी भी कुछ नही लिख रहा था |

बीत गया सारा समय कश्मकश में, 
दिमाग़ में शायद कुछ घोटाला चल रहा था |
“कैसा हुआ पेपर भाई ??” पूछा अपने दोस्त से,
मुस्कुरा दिए हम भी जब वो भी मुस्कुरा रहा था |



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